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Script — Devanagari

नवमः पाठः — कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः ,पाठ के तीन महत्त्वपूर्ण श्लोक एवं हिन्दी अर्थ

कक्षा 9 संस्कृत शारदा के नवम पाठ कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः के तीनों महत्त्वपूर्ण श्लोक, पदच्छेद, शब्दार्थ, हिन्दी अर्थ एवं भावार्थ।

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संस्कृतम् — शारदा कक्षा — नवमी नवमः पाठः — कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः

पाठ के तीन महत्त्वपूर्ण श्लोक एवं हिन्दी अर्थ

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श्लोकः — 1

भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥**

पदच्छेदः भैक्षप्रदानेन, चिरम्, परैः, उपकृताः, वयम्। कृतम्, प्रतिकृतम्, भूयात्, एषः, धर्मः, सनातनः।

शब्दार्थाः

  • भैक्षप्रदानेन — भिक्षा देने से।
  • चिरम् — बहुत समय तक।
  • परैः — दूसरों के द्वारा।
  • उपकृताः — उपकार किए गए।
  • वयम् — हम।
  • कृतम् — किया हुआ।
  • प्रतिकृतम् — प्रत्युपकार।
  • भूयात् — होना चाहिए।
  • एषः — यह।
  • सनातनः — शाश्वत।

हिन्दी अर्थ हम दूसरों के द्वारा भिक्षा प्रदान किए जाने से बहुत समय तक उपकृत हुए हैं। इसलिए हमारे द्वारा भी किए गए उपकार का प्रत्युपकार होना चाहिए। यही सनातन धर्म है।

भावार्थ मनुष्य को दूसरों के द्वारा किए गए उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए। जब भी अवसर मिले, हमें उनके उपकार का बदला उपकार करके चुकाना चाहिए। यही हमारा शाश्वत धर्म है।

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श्लोकः — 2

इमे हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥**

पदच्छेदः इमे, हि, पीवरौ, बाहू, सहायौ, सहजौ, मम। बकम्, विध्वंसयिष्यामि, सिंहः, क्षुद्रमृगम्, यथा।

शब्दार्थाः

  • इमे — ये दोनों।
  • हि — निश्चय ही।
  • पीवरौ — पुष्ट एवं शक्तिशाली।
  • बाहू — दोनों भुजाएँ।
  • सहायौ — सहायक।
  • सहजौ — जन्म से प्राप्त।
  • मम — मेरी।
  • बकम् — बकासुर को।
  • विध्वंसयिष्यामि — नष्ट कर दूँगा।
  • सिंहः — सिंह।
  • क्षुद्रमृगम् — छोटे एवं तुच्छ पशु को।
  • यथा — जिस प्रकार।

हिन्दी अर्थ मेरी ये दोनों पुष्ट भुजाएँ स्वाभाविक रूप से मेरी सहायक हैं। जिस प्रकार सिंह किसी छोटे पशु को मार डालता है, उसी प्रकार मैं बकासुर का विनाश कर दूँगा।

भावार्थ इस श्लोक में भीम अपनी शारीरिक शक्ति और आत्मविश्वास प्रकट करते हुए कहते हैं कि मेरी दोनों शक्तिशाली भुजाएँ ही मेरी सबसे बड़ी सहायक हैं। मैं बकासुर का उसी प्रकार विनाश करूँगा, जैसे सिंह किसी छोटे पशु का करता है।

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श्लोकः — 3

**रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्।

निषूटक: हिडिम्बस्य मृत्युश़्चास्मि भवद्वशात्॥**

पदच्छेदः रक्षिता, साधुलोकानाम्, वरिष्ठः, बाहुशालिनाम्। निषूटक: हिडिम्बस्य, मृत्युः,च, अस्मि, भवद्वशात्।

शब्दार्थाः

  • रक्षिता — रक्षा करने वाला।
  • साधुलोकानाम् — सज्जन लोगों की।
  • वरिष्ठः — श्रेष्ठ।
  • बाहुशालिनाम् — बलशाली पुरुषों में।

-निषूटक: — विनष्ट किया हुआ (

  • हिडिम्बस्य — हिडिम्ब का।
  • मृत्युः — मृत्यु।
  • अस्मि — हूँ।
  • भवद्वशात् — आपके कारण अथवा आपके प्रभाव से।

हिन्दी अर्थ मैं सज्जन लोगों की रक्षा करने वाला तथा बलशाली पुरुषों में श्रेष्ठ हूँ। आपके कारण मैं हिडिम्ब के विनाश का कारण बना हूँ।

भावार्थ इस श्लोक में वीरता, शक्ति तथा सज्जनों की रक्षा करने के कर्तव्य का वर्णन किया गया है। वीर पुरुष अपनी शक्ति का प्रयोग दूसरों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए करता है।

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तीनों श्लोकों से मिलने वाली शिक्षा

  1. हमें दूसरों के उपकार का प्रत्युपकार करना चाहिए।
  2. मनुष्य को अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य पर विश्वास रखना चाहिए।
  3. सज्जनों की रक्षा करना तथा दुष्टों का विरोध करना वीर पुरुष का कर्तव्य है।

निष्कर्ष—

परोपकार, आत्मविश्वास, वीरता और धर्मपालन ही मनुष्य के जीवन के श्रेष्ठ आदर्श हैं।